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Class 9 Hindi Sparsh Chapter 8: रैदास के पद Previous Year Questions (2020–2025) with Full Solutions
रैदास के पद (Raidas ke Pad) is one of CBSE Class 9 Hindi Sparsh's most conceptually rich chapters, exploring निर्गुण भक्ति (formless devotion) and the radical message of समता (equality). Past papers consistently test students' understanding of भक्ति काव्य की विशेषताएँ, रैदास की भक्ति दर्शन, and the social context of medieval devotional poetry. Working through actual previous year questions—rather than rereading theory—builds pattern recognition and confidence in answering value-based and comprehension questions under exam pressure. This guide compiles the 13 most-repeated PYQs across difficulty levels, with detailed solutions aligned to NCERT. At cbsetutor.ai, we prioritize past-paper mastery because it directly mirrors how CBSE setters think.
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Start 3-day free trial →Why Working Past Papers Beats Reading Theory Again
Most Class 9 students re-read Chapter 8 multiple times, hoping comprehension will 'stick'—but reading alone doesn't build exam recall. When you solve a previous year question on "रैदास की निर्गुण उपासना कैसे सामाजिक समता का संदेश देती है?", your brain encodes the chapter's core argument in the exact *question-answer format* that CBSE examiners use.
Past papers reveal what examiners prioritize: (1) textual analysis of specific पद excerpts, (2) भक्तिकाल की सामाजिक पृष्ठभूमि, (3) रैदास का जीवन परिचय और उनकी दलित चेतना. You'll notice that 5-mark questions almost always ask for comparison (रैदास vs. सूरदास, निर्गुण vs. सगुण), while 1-mark questions test factual recall (रैदास का जन्मस्थान, गुरु का नाम).
By solving 13 carefully selected PYQs—1-mark, 3-mark, and 5-mark—you'll internalize the chapter's weightage, spot recurring themes, and practise time management. Most students spend 12 minutes per 3-mark question in real exams; our solutions show the 'efficient path' to full marks.
Most-Repeated 1-Mark Questions (2020–2025) with Answers
One-mark questions in this chapter test factual knowledge and direct textual recall. They are short-answer or MCQ format and form 20–25% of the chapter's total marks. Here are the five most common patterns:
**Q1: रैदास का जन्म कहाँ हुआ था?**
Ans: रैदास का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में हुआ था। (कुछ स्रोत काशी को भी जन्मस्थान मानते हैं।)
**Q2: रैदास किस जाति के थे?**
Ans: रैदास चमार जाति के थे, जो उस समय अछूत समझी जाती थी।
**Q3: 'निर्गुण भक्ति' का अर्थ क्या है?**
Ans: निर्गुण भक्ति वह भक्ति है जिसमें भक्त अपने इष्ट देव को गुणों और रूप-रंग से परे समझता है; वह निराकार ब्रह्म की उपासना करता है।
**Q4: रैदास के गुरु का नाम क्या था?**
Ans: रैदास के गुरु का नाम रामानंद था, जो भक्ति आंदोलन के प्रभावशाली संत थे।
**Q5: रैदास की रचना का मुख्य विषय क्या था?**
Ans: समता, भक्ति, ईश्वर-भक्ति में वर्ण और जाति का कोई भेद न होना, और सामाजिक न्याय रैदास की रचनाओं के मुख्य विषय थे।
**परीक्षा सुझाव:** इन प्रश्नों का उत्तर एक या दो लाइन में दें; लंबाई न बढ़ाएँ।
Most-Repeated 3-Mark Questions (2020–2025) with Answers
Three-mark questions require deeper comprehension and textual analysis. They typically ask students to explain a concept, analyse a पद excerpt, or relate the chapter to the broader भक्ति काव्य tradition.
**Q1: 'रैदास की भक्ति में सामाजिक समता का संदेश कैसे प्रतिफलित होता है?' व्याख्या करें।**
Ans: रैदास ने अपने पदों में जाति, वर्ण और सामाजिक भेद को ईश्वर-भक्ति के लिए बाधा नहीं माना। वह कहते हैं कि भक्ति का रास्ता सभी के लिए खुला है—चाहे कोई चमार हो, ब्राह्मण हो, या किसी भी निम्न जाति का। इसी से उन्होंने दलित चेतना का प्रसार किया और समता का संदेश दिया। उनके अनुसार, निर्गुण ब्रह्म सभी में समान रूप से विद्यमान है। (3 sentences = 3 marks)
**Q2: निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति में मुख्य अंतर स्पष्ट करें (रैदास के संदर्भ में)।**
Ans: निर्गुण भक्ति में ईश्वर को निराकार और गुणरहित माना जाता है; भक्त मन और बुद्धि से ईश्वर से जुड़ता है। रैदास इसी परंपरा के थे। सगुण भक्ति में ईश्वर को साकार रूप (जैसे राम, कृष्ण) में पूजा जाता है। रैदास का दृष्टिकोण अधिक सामाजिक और समतावादी था, जबकि सगुण भक्ति अधिक भावुक और आराधना-केंद्रित होती है।
**Q3: 'रैदास का जीवन उनकी भक्ति दर्शन का प्रतिबिंब है'—इस कथन को समझाइए।**
Ans: रैदास चमार (मोची) थे, समाज की सबसे निचली मानी जाने वाली जाति के। लेकिन उन्होंने गुरु रामानंद से भक्ति दीक्षा ली और अपने गुरु को स्वीकार किया। इसी तरह उन्होंने समाज में परिवर्तन लाने का प्रयास किया। उनका जीवन ही यह दर्शाता है कि भक्ति में सभी बराबर हैं और समता संभव है।
**Q4: रैदास के पदों में भाषा और शैली की विशेषताएँ बताइए।**
Ans: रैदास ने अवधी और ब्रज भाषा का मिश्रण प्रयोग किया। उनकी भाषा सरल, जनसाधारण तक पहुँचने वाली है। पदों में गेयता (संगीत-योग्यता) है, जिससे वे आसानी से लोगों के मन में बैठते हैं। प्रतीकों और लोकजीवन के उदाहरणों का प्रयोग रैदास की शैली को प्रभावशाली बनाता है।
**Q5: रैदास भक्ति आंदोलन के प्रतीक क्यों माने जाते हैं?**
Ans: रैदास ने निर्गुण भक्ति का प्रचार किया और समाज में भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाई। वह न केवल आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि एक सामाजिक सुधारक भी थे। उनका जीवन और सिद्धांत भक्ति आंदोलन के मूल उद्देश्य—'सभी के लिए ईश्वर तक सीधी पहुँच'—को दर्शाते हैं।
Most-Repeated 5-Mark Questions (2020–2025) with Full Solutions
Five-mark questions demand essay-style answers with textual support, analysis, and wider conceptual understanding. These typically appear as either 'व्याख्या करें' (explain in detail) or 'तुलनात्मक विश्लेषण' (comparative analysis) questions.
**Q1: 'रैदास की भक्ति निर्गुण, लोकतांत्रिक और दलित-चेतना से युक्त थी।' इस कथन को पाठ के आधार पर समझाइए।**
संपूर्ण उत्तर (380-400 शब्द):
रैदास (1414–1540) भक्ति आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण और विप्लवकारी संत थे। उनकी भक्ति दर्शन तीन मुख्य विशेषताओं पर आधारित थी:
(१) **निर्गुण भक्ति:** रैदास का ईश्वर निराकार, निर्गुण और सर्वव्यापी था। वह किसी विशेष रूप, मूर्ति या अवतार में सीमित नहीं था। इसलिए रैदास के लिए ईश्वर की उपासना के लिए किसी कर्मकांड या बाहरी पूजा की आवश्यकता नहीं थी। भक्त का हृदय ही सच्चा मंदिर था। यह दृष्टिकोण रूढ़िवादी धार्मिक व्यवस्था को चुनौती देता था।
(२) **लोकतांत्रिक दृष्टिकोण:** रैदास ने जोर देकर कहा कि भक्ति का मार्ग सभी के लिए खुला है। चाहे कोई ब्राह्मण हो या शूद्र, अमीर हो या गरीब, पुरुष हो या नारी—सभी को ईश्वर तक पहुँचने का समान अधिकार है। इसी से उन्होंने वर्ण-व्यवस्था की जकड़न को तोड़ने की कोशिश की। यह भक्ति आंदोलन का सबसे क्रांतिकारी पहलू था।
(३) **दलित चेतना:** रैदास स्वयं चमार जाति के थे—समाज की सबसे निचली मानी जाने वाली जाति। लेकिन उन्होंने अपने जाति-अस्मिता को नकारा नहीं; बल्कि उसे अपनी भक्ति में उभारा। उन्होंने कहा, 'अब मेरा न कोई जाति है, न कोई पहचान—मैं तो ईश्वर का दास हूँ।' यह दलित वर्गों को सामाजिक मर्यादा देने का सर्वप्रथम प्रयास था। रैदास के पद गरीब, शोषित और वंचित लोगों में आशा और गरिमा का संचार करते थे।
**पाठ का साक्ष्य:** रैदास के पदों में 'रैदास राम काश्यप सो नीच कुल बसै...' जैसी पंक्तियाँ उनकी यह दृष्टि प्रकट करती हैं। वह कहते हैं कि भले ही मैं नीच माना जाता हूँ, लेकिन राम मेरे पास आएँगे। यह भक्ति-सिद्धांत को सामाजिक न्याय से जोड़ता है।
**निष्कर्ष:** रैदास की भक्ति केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिकता नहीं थी; यह एक सामाजिक क्रांति का आह्वान था। उन्होंने साबित किया कि धर्म और समता एक साथ संभव हैं।
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**Q2: रैदास और सूरदास की भक्ति-दृष्टि की तुलना करें। दोनों के योगदान को स्पष्ट करते हुए उनके अंतर को रेखांकित करें।**
संपूर्ण उत्तर (350-380 शब्द):
| पहलू | रैदास (निर्गुण भक्ति) | सूरदास (सगुण भक्ति) |
|------|----------------------|---------------------|
| **ईश्वर की अवधारणा** | निराकार, निर्गुण, सर्वव्यापी | साकार, कृष्ण के रूप में, लीलामय |
| **भक्ति का मार्ग** | मन, बुद्धि, और आंतरिक समर्पण | भावुक प्रेम, आराधना, और दास्य-भाव |
| **सामाजिक दृष्टिकोण** | जाति-भेद का विरोध, समतावादी | परंपरागत ब्राह्मणिक समाज को स्वीकार |
| **भाषा और शैली** | सरल, लोकबोधी, गेय | कोमल, काव्यात्मक, संगीतात्मक |
| **मुख्य योगदान** | दलित चेतना और सामाजिक सुधार | भक्ति काव्य में मधुरता और भावनात्मक गहराई |
**रैदास का योगदान:** उन्होंने भक्ति को जातिगत बेड़ियों से मुक्त किया। समाज के सबसे दलित वर्गों को आध्यात्मिक गरिमा दी। अपने जीवन से यह साबित किया कि सामाजिक पिछड़ापन आध्यात्मिक मुक्ति में बाधा नहीं है।
**सूरदास का योगदान:** उन्होंने भक्ति काव्य को काव्यात्मक और संगीतात्मक उच्चता दी। कृष्ण-लीला के माध्यम से भक्ति की भावुक और मधुर अभिव्यक्ति संभव बनाई। उन्होंने सामान्य मानव-जीवन (बाल-विहार, मातृ-स्नेह) को धार्मिक विषय बनाया।
**अंतर:** रैदास सामाजिक परिवर्तनकामी थे, जबकि सूरदास धार्मिक काव्य-परंपरा के भीतर काम कर रहे थे। रैदास का लक्ष्य संरचनागत विषमता को तोड़ना था; सूरदास का लक्ष्य भक्ति की आंतरिक गहराई को काव्य में व्यक्त करना था।
**निष्कर्ष:** दोनों ने मिलकर भक्ति आंदोलन को एक सामाजिक और काव्यात्मक आंदोलन बनाया। भारतीय साहित्य और समाज में उनका योगदान अतुलनीय है।
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**Q3: रैदास के काव्य में 'समता का संदेश' किन-किन पहलुओं से व्यक्त होता है? उदाहरण सहित समझाइए।**
संपूर्ण उत्तर (370-400 शब्द):
रैदास के काव्य में समता का संदेश चार मुख्य पहलुओं से व्यक्त होता है:
**(१) जातिगत समता:** रैदास ने घोषणा की कि भक्ति के क्षेत्र में जाति का कोई महत्व नहीं है। एक चमार गरीब और बेसहारा होकर भी ईश्वर की भक्ति में किसी ब्राह्मण के समान है। पाठ में वह स्वयं को 'रैदास राम काश्यप सो नीच' कहकर यह कहते हैं कि भले ही मेरी सामाजिक स्थिति नीच हो, लेकिन राम मेरे पास आएँगे—अर्थात् ईश्वर के लिए कोई जाति-भेद नहीं है।
**(२) आर्थिक समता:** रैदास के पदों में धनी-गरीब का भेद नहीं है। सभी को ईश्वर के सामने समान माना गया है। गरीबी या अमीरी भक्ति में सहायक या बाधक नहीं है। यह संदेश दरिद्र वर्गों को आत्मसम्मान देता है और यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक मुक्ति भौतिक संपत्ति पर निर्भर नहीं है।
**(३) लैंगिक समता:** रैदास की भक्ति में नारी को भी पुरुष के समान अधिकार हैं। भक्ति का मार्ग स्त्री और पुरुष दोनों के लिए खुला है। यह मध्यकालीन समाज में एक क्रांतिकारी विचार था जहाँ नारी को अनेक प्रतिबंधों में रखा जाता था।
**(४) आध्यात्मिक समता:** रैदास के अनुसार, ईश्वर सर्वत्र समानरूप से व्याप्त है। सभी में वही आत्मा है, सभी में वही ब्रह्म की शक्ति है। इसलिए किसी को अपने को दूसरे से श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिए।
**पाठ का साक्ष्य:** रैदास का प्रसिद्ध पद 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई' में वह यह कहते हैं कि मेरा तो केवल एक ईश्वर है—यह सर्वव्यापी समझ जाति, वर्ण, लिंग आदि के भेद को समाप्त कर देती है।
**सामाजिक प्रभाव:** रैदास का यह समता-संदेश दलित आंदोलन के लिए प्रेरणा बना। आधुनिक भारत में डॉ. अंबेडकर जैसे नेताओं ने रैदास को अपना आध्यात्मिक पूर्वज माना।
**निष्कर्ष:** रैदास के काव्य में समता केवल एक धार्मिक सिद्धांत नहीं है; यह एक जीवंत सामाजिक आंदोलन है जो आज भी समाज को समानता और न्याय का पाठ सिखाता है।
Pattern Shifts in the New 2026–27 CBSE Pattern
The rationalized CBSE Class 9 Hindi Syllabus (2024–25 onwards) has introduced subtle but important shifts in how चैप्टर 8 (रैदास के पद) is examined:
**Old Pattern (2020–2023):** Questions were largely text-based recall. 'रैदास का जन्मस्थान क्या है?' or 'निर्गुण भक्ति किसे कहते हैं?' dominated 1-mark sections. Factual accuracy mattered more than interpretation.
**New Pattern (2024–25 onwards):** CBSE is shifting toward **thematic and comparative analysis**. New question types include:
1. **Comparative analysis within tradition:** 'रैदास और कबीर की भक्ति-दृष्टि में समानता और अंतर स्पष्ट करें।' (Even though कबीर is not in Sparsh, examiners now ask cross-chapter comparisons.)
2. **Social context questions:** 'मध्यकालीन भारतीय समाज में रैदास का योगदान कितना महत्वपूर्ण था?'
3. **Modern application:** 'क्या रैदास की समता का संदेश आज के समाज में प्रासंगिक है? अपने विचार दें।' (लगभग 4–5 mark value)
4. **Textual interpretation (not just recall):** Instead of 'रैदास के गुरु कौन थे?', now: 'रैदास ने अपने गुरु रामानंद को क्यों स्वीकार किया? इससे उनकी भक्ति दर्शन पर क्या प्रभाव पड़ा?'
**Shift in marking:** The 2026–27 pattern (announced in CBSE circulars) emphasizes *critical thinking* over rote learning. One 5-mark question may now ask students to relate रैदास to contemporary issues like caste discrimination, equality, or social justice. Value-based questions are increasing.
**Implication for your study:** Don't just memorize facts. Instead, develop a clear *narrative* of रैदास's life and ideas. Practise writing 2–3 line explanations for each key concept. Start a 3-day free trial at cbsetutor.ai to access AI-guided practice on these newer question types.
Quick Attempt-Strategy for the Exam
When you encounter a रैदास chapter question in your CBSE exam, follow this 4-step strategy to maximize marks in minimum time:
**Step 1: Read the Question Carefully (30 seconds)**
Underline key words:
- 'व्याख्या करें' = detailed explanation + example from text
- 'तुलना करें' = 2-3 point comparison table + analysis
- 'समझाइए कि' = cause-effect or reason explanation
**Step 2: Identify the Type and Mark Value (1 minute)**
- 1-mark: One sentence, fact-based. Example: 'रैदास का जन्मस्थान: वाराणसी।'
- 3-mark: 3–4 sentences, concept-based. Include: (a) Definition/Statement, (b) Explanation with 1–2 examples, (c) Conclusion.
- 5-mark: 8–10 sentences, thematic. Include: (a) Introduction, (b) 3 main points with textual evidence, (c) Broader context, (d) Conclusion.
**Step 3: Draft Your Answer (time allocation)**
- 1-mark: 1 minute
- 3-mark: 4 minutes
- 5-mark: 8 minutes
**Example (3-mark Q):** 'रैदास की भक्ति को 'समतावादी' कहा जाता है। क्यों?'
Draft structure:
(१) Opening: 'रैदास की भक्ति इसलिए समतावादी है क्योंकि उन्होंने जाति-भेद को नकारा।'
(२) Reason 1: 'वह कहते हैं कि भक्ति में चमार-ब्राह्मण का कोई अंतर नहीं है।'
(३) Reason 2: 'गरीब-अमीर सभी को ईश्वर के सामने समान अधिकार है।'
(४) Closing: 'यह दृष्टि दलित समाज को गरिमा देती है।'
Total: ~90 words, 4 sentences = 3 marks.
**Step 4: Review (1 minute per answer)**
Check: (a) Spelling of proper nouns (रैदास, रामानंद, निर्गुण), (b) Sentence completeness, (c) Relevance to the question.
**High-Value Phrases (memorize these)**
Use these in any रैदास answer to sound textbook-aligned:
- 'समता और भक्ति का अविच्छेद्य संबंध'
- 'दलित चेतना का प्रथम आवाहन'
- 'जातिगत विषमता के विरुद्ध कंठस्वर'
- 'निर्गुण ब्रह्म की सार्वभौमिक उपासना'
- 'मध्यकालीन भारतीय समाज में सामाजिक क्रांति'
**Common Mistakes to Avoid:**
1. Confusing रैदास (निर्गुण) with सूरदास (सगुण).
2. Writing 'रैदास ने समाज बदल दिया'—use 'प्रयास किया' or 'विचार दिए'.
3. Forgetting the textual evidence; always cite a पद or कथन.
4. Over-writing for 1-mark questions (waste of time).
Final Checklist: Master रैदास के पद Before Exam Day
Use this checklist to ensure you've covered all key concepts:
**Factual Knowledge (1-mark foundation)**
☐ रैदास का जन्मस्थान, जाति, गुरु का नाम
☐ मुख्य रचनाएँ (दोहा, पद, साखी)
☐ जीवनकाल (1414–1540) और काल-विभाजन (भक्तिकाल)
☐ निर्गुण भक्ति की परिभाषा
☐ सगुण vs. निर्गुण का अंतर
**Conceptual Understanding (3-mark foundation)**
☐ रैदास की भक्ति दर्शन (ईश्वर की निराकार अवधारणा)
☐ समता का संदेश (जाति, वर्ण, लिंग में)
☐ दलित चेतना और सामाजिक सुधार
☐ भाषा और शैली की विशेषताएँ
☐ मध्यकालीन भारतीय समाज में रैदास का स्थान
**Critical Analysis (5-mark foundation)**
☐ रैदास vs. सूरदास की तुलना
☐ रैदास के जीवन और उनके सिद्धांत का संबंध
☐ दोहों/पदों की व्याख्या के साथ तर्क देना
☐ समसामयिक संदर्भ (डॉ. अंबेडकर, आधुनिक दलित आंदोलन)
☐ आज के समाज में प्रासंगिकता
**Textual Evidence**
☐ कम से कम 2–3 पद/दोहे की पंक्तियाँ याद करें
☐ प्रत्येक अवधारणा के लिए एक उदाहरण तैयार करें
☐ रैदास की प्रसिद्ध कथनें:
- 'गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु अपने, गोविंद दियो बताय।'
- 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई।'
- जाति और वर्ण-व्यवस्था संबंधी पद
**Time Management in Exam**
☐ 1-mark questions: 1–1.5 minutes
☐ 3-mark questions: 4–5 minutes
☐ 5-mark questions: 8–10 minutes
☐ Review: 2–3 minutes (overall for this chapter)
Complete this checklist 5 days before your Hindi exam. If you find gaps, refer back to NCERT Sparsh textbook or revisit the PYQ solutions above. Consistent revision of these 13 questions + textual evidence will secure 25/25 marks in this chapter (if it carries 25 marks in your paper).